पीड़ितों-जरूरतमंदों की सेवा सर्वप्रथम: संजीव कुमार सिंह

@ बिहार के बिखरे मोती/कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार।

# कर्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी की बने प्रतिमूर्ति
# नेकनीयती व समदर्शिता से मिल रहा यश

नई दिल्ली। अपनी नेकनीयती और समदर्शिता के चलते गुजश्ते समय के शिलालेख पर एक सशक्त हस्ताक्षर बन चुके हैं बिहार पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह। सूबे में व्याप्त भ्रष्टाचार से इतर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की जो मिशाल बामशक्क्त उन्होंने खड़ी की है, उसकी खुशबू दूर-दूर तक फैल चुकी है। आपको यह जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि किसी भी आकस्मिक घटना/दुर्घटना से पीड़ित हुए लोगों की मदद के लिये सबसे पहले पहुँचने वाली पुलिस का दमदार किरदार कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारीपूर्वक निभाना पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह को बचपन से ही पसंद है।

शायद यही वजह है कि करियर निर्धारण की तमाम कंटकाकीर्ण परिस्थितियों पर विजय पाकर जब वो बिहार पुलिस की सेवा में आये तो सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद के ‘नमक का  दारोगा’ वाली कहानी से पुलिस के प्रति अबतक समाज की बनती चली आ रही पीढ़ी दर पीढ़ी वाली नकारात्मक अवधारणा को अपनी कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के बलबूते पूरी तरह से झुठलाने की न केवल पूरजोर कोशिश की, बल्कि अपने नेक इरादे में अत्यंत सफल भी हुए।

कहना न होगा कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रशासनिक क्षितिज पर अमूमन ‘जंगलराज’ का पर्याय समझे जाने वाले बिहार प्रशासन, विशेषकर बिहार पुलिस के लिए यह अत्यंत गौरव की बात है। साथ ही यह अहसास दिलवाने को भी काफी कि यदि उनके जैसे ‘समदर्शी और नेकनीयती’ वाले पुलिस अधिकारियों के चयन को सक्षम नियुक्तिमण्डल द्वारा बढ़ावा दिया जाय तो देश को सबसे ज्यादा नौकरशाह देने वाला प्रान्त बिहार में ‘मंगलराज’ स्थापित होते देर नहीं लगेगी।

इस बात में कोई दो राय नहीं कि बिहार के सुप्रसिद्ध पटना विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (इतिहास) की उपाधि हासिल करने वाले पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह का जीवन मूल्य और यथार्थ दर्शन, न केवल समसामयिक बल्कि भावी युवा पीढ़ी के लिए भी एक बेहतर नजीर साबित हो सकता है, बशर्ते कि सक्षम प्रशासन इसे महसूस करे, स्वीकार करे और अहम विभागीय कार्यकलापों के निष्पक्ष निष्पादन में ऐसे ही तटस्थ पुलिस अधिकारियों को बढ़ावा दे। यही नहीं, एेसे रोल मॉडल को बतौर प्रेरणास्रोत अपने अकादमिक क्रियाकलापों में भी शामिल करे जिससे कि न केवल समसामयिक बल्कि भावी पीढ़ी भी प्रेरणा ले सके। कहना न होगा कि यदि ऐसे पुलिस अधिकारियों की सकारात्मक छवि की यदि अंतर्विभागीय ब्रांडिंग की जायेगी, तो व्यवस्थागत भ्रष्टाचार और कर्तव्यगत कोताही से निबटना न केवल आसान हो जायेगा, बल्कि अन्य लोग भी ऐसे लोगों से प्रेरणा ले सकेंगे।

यही वजह है कि सुप्रसिद्ध समाचार-विचार वेबसाइट newscircle.in के विशेष संवाददाता कमलेश पांडे, वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार, ने बिहार के कतिपय बिखरे मोतियों में शुमार किये जाने वाले पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह की कतिपय तुच्छ लेकिन मानवता और व्यवस्था के लिहाज से अत्यंत अहम/संवेदनशील उपलब्धियों से देश-प्रदेश को रु-ब-रु कराने का बीड़ा उठाते हुए न केवल उनसे दो टूक बातचीत की, बल्कि इसी क्रम में बेहतर पुलिसिंग के वो टिप्स भी हासिल किये जिस पर यदि ईमानदारी और दूरदर्शितापूर्वक अमल किया जाय तो आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की संयुक्त चुनौतियों से जूझ रहे प्रदेश को न केवल एक नई दिशा मिलेगी बल्कि शेष भारत भी उसका सम्यक अनुकरण कर आशातीत लाभ उठा सकेगा।

यहाँ प्रस्तुत है उनसे हुई दो टूक बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश:-

न्यूज़ सर्किल : ‘बिहार के बिखरे मोती’ साक्षात्कार श्रृंखला की पहली कड़ी में आपका स्वागत है। यह किसी भी व्यक्ति के लिये बड़े ही सौभाग्य की बात है। क्या मैं जान सकता हूँ कि बिहार पुलिस की सेवा में आने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

संजीव कुमार सिंह: जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरिषयशी।बेशक, मेरी माता जी श्री मती चंद्रकांता सिंह, अवकाशप्राप्त सरकारी शिक्षिका, श्री चंद मध्यविद्यालय, कुर्जी, पटना ही मेरी प्रेरणास्रोत रही हैं। तब वो मुंगेर जिले के प्राथमिक सह मध्य विद्यालय, चाफा, मासुमगंज में सेवारत थीं। उन्होंने बचपन से ही मुझे ईमानदारीपूर्वक सही दिशा/रास्ते, में/पर चलने के लिए प्रोत्साहित किया और उचित मार्गदर्शन प्रदान करने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी, जिसका संपूर्ण असर मेरे निष्कपट व्यक्तित्व पर पड़ा।
उनके अलावा, मेरे पिताजी श्री विजय कुमार सिंह खुद पटना के एक कनीय पुलिस पदाधिकारी थे, जिनसे पुलिस में रहकर आमलोगों की अहर्निश सेवा करते रहने की प्रेरणा मुझे बतौर विरासत मिली जिसे निभाना मेरा परम् सौभाग्य है। चूंकि वर्दी की आन, बान, शान से मैं पूर्व परिचित रहा और किसी भी आकस्मिक घटना/दुर्घटना से पीड़ित हुए लोगों की पहली निःस्वार्थ मदद करते रहने की तमन्ना मेरे दिल में छुपी रहती है। इसलिए मैंने बिहार पुलिस की सेवा में जाने का दूरदर्शितापूर्ण निर्णय लिया, जिसे पूरा करने में ईश्वर ने भी मेरी भरपूर मदद की और उम्मीद ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आगे भी वो मेरी मदद करते रहेंगे। अपनी जन्मभूमि और अपने लोगों की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, इसके लिए मैं जीवनपर्यंत उनका शुक्रगुजार बना रहूंगा।
और हाँ, आपके ‘समाचार-विचार समूह’ जिसने हमारे कर्मयोग को इस अहमियत के काबिल समझा, इसके लिए मैं आप सबों का आभार प्रकट करता हूँ।

न्यूज़ सर्किल: आप ‘निष्काम कर्मयोगी’ बताए जाते हैं। आपके ‘हंस विवेक’ पर आपके विभाग को भरोसा रहता है। आपकी पब्लिक इमेज भी अच्छी है।

संजीव कुमार सिंह: मैं उस मध्यवर्गीय परिवार से आता हूं जहाँ दादी-नानी अपने बच्चों को ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की शिक्षा बतौर संस्कार बचपन से ही देती हैं। वो बच्चों को संघर्षमय जीवन पथ पर सदैव सावधान रहते हुए बिलकुल सही रास्ते पर चलने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करती रहती हैं। स्वाभाविक है कि मेरी कार्यसंस्कृति और मेरे विवेक पर भी इन सद्गुणों का असर जरूर पड़ता है। आप मानें या न मानें, लेकिन इस पृष्ठभूमि को मद्देनजर रखकर लिया गया कोई भी निर्णय, कभी भी, किसी को भी, कतई धोखा नहीं देगा।
यही वजह है कि हमारे द्वारा निष्पादित कार्य की गुणवत्ता, जिसे आप ‘हंस विवेक’ करार दे रहे हैं, हमेशा अव्वल बनी रहती है, जिससे वरिष्ठ अधिकारी भी प्रसन्न रहते हैं। वजह यह कि जब भी किसी के द्वारा मुझे कोई भी सामान्य अथवा दुरूह कार्य सौंपा जाता है, अत्यंत अहम जिम्मेवारी दी जाती है तो मैं उससे जुड़े तमाम पहलुओं का ईमानदारीपूर्वक सम्यक विवेचन करके उसे अविलम्ब पूरा करने में जुट जाता हूँ। यही नहीं, अपने अधीनस्थों या वरिष्ठों से भी इसी प्रकार के सकारात्मक सहयोग की उम्मीद करता हूँ ताकि तय मानकों के अनुरूप सम्बन्धित कार्य को समय पर निष्पादित किया जा सके।
यही वजह है कि मैं अपने पुनीत उद्देश्य में अक्सर कामयाब रहता हूँ, और यदि कभी असफलता मिलती भी है तो उससे परेशान हुए बगैर अविलम्ब भूल-सुधार की कोशिशें करता हूँ और तबतक उस पर सतत निगाह रखता हूँ जबतक कि उसमें सफलता न मिल जाय। यही वजह है कि पब्लिक इमेज अपने आप निखरती चली जाती है, क्योंकि ये पब्लिक है, सब जानती है।

न्यूज़ सर्किल: क्या वजह है कि अपराधी आपके नाम से ही भय खाते हैं? जबकि स्वभाव से आप अत्यंत विनम्र और सहृदयी पुलिस अधिकारी हैं।

संजीव कुमार सिंह: देखिये, घर हो या दफ्तर या फिर कार्यक्षेत्र, मैं किसी भी कार्य को पूरी निष्ठा, ईमानदारी और तत्परतापूर्वक करने की पूरी कोशिश करता हूँ ताकि उससे जुड़े या प्रभावित लोगों का अधिकाधिक भला हो सके। यही वजह है कि कतिपय शातिर अपराधी अथवा भ्रष्ट लोग किसी भी विषय में मेरा नाम जुड़ते ही सचेत हो जाते हैं। उन्हें हैरत होती है कि अंततोगत्वा वह पुलिस की गिरफ्त में आने से बच नहीं पाते हैं, जिसका उन्हें हमेशा अफ़सोस रहता है। कर्तव्य निर्वहन के दौरान मैं अत्यंत सख्ती से पेश आता हूँ, क्योंकि अपने दायित्व की पूर्ति करने के बाद मुझे असीम खुशी मिलती है।

न्यूज़ सर्किल: आपके विभागीय आदर्श कौन-कौन से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं।

संजीव कुमार सिंह: पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अभ्यानन्द, पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) मि. परेश सक्सेना और पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) कुंदन कृष्णन जैसे गिने-चुने  आईपीएस अधिकारी ही हमारे आदर्श हैं जो अपनी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और नेकनीयती के लिए पूरे पुलिस महकमे में सुप्रसिद्ध हैं। बिहार पुलिस की सकारात्मक छवि में इनका बहुत बड़ा योगदान है। आज ये सभी लोग पूरे देश की पुलिस के बीच किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।

Big Box # # पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह की संक्षिप्त पृष्ठभूमि:

मुंगेर, भागलपुर और बाँका जिले की सीमा पर अवस्थित है असरगंज प्रखंड मुख्यालय जो मुंगेर जिले के तारापुर अनुमंडल अंतर्गत है। असरगंज कचहरी अंग्रेजों के जमाने में भी सुप्रसिद्ध रही, जिसका नियंत्रण तब सुलतानगंज गढ़ स्थित राजबनैली इस्टेट से होता था। इनके पूर्वज उसके राजस्व कर्ताधर्ता थे।
असरगंज प्रखंड स्थित ग्राम पंचायत रहमतपुर का एक छोटा सा मोहल्ला है रहमतपुर बासा जिसके बाशिन्दे बिहार सरकार में संतरी से लेकर मंत्री तक के पद को भी सुशोभित कर चुके हैं। आप चाहे गुलाम भारत की बात करें या फिर आजाद भारत की, इस छोटे से मोहल्ले ने जनाकांक्षाओं को कभी निराश नहीं किया। यही वजह है कि यहां के लोग देश-विदेश में कई अहम पदों पर तैनात हैं।
इसी मोहल्ले के बाबू महावीर सिंह के प्रपौत्र हैं संजीव कुमार सिंह। स्थानीय सरकारी शिक्षिका श्री मती चंद्रकांता और  जूनियर पुलिस अधिकारी श्री विजय कुमार सिंह दम्पती के लिए 28 जनवरी 1965 का दिन वाकई सौभाग्यशाली रहा होगा जब उनकी प्रथम संतान के रूप में पुलिस इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह की किलकारियां गूंजी। सच्चाई भी यही है कि तब इनके बाबा बाबू योगेंद्र सिंह और उनके सहोदर भाई बाबू रामानंद सिंह, तत्कालीन उपमुखिया, रहमतपुर ग्राम पंचायत ने इस जन्मोत्सव की ख़ुशी को अपने गांव-समाज संग उदारतापूर्वक बांटा, ताकि लोकयश की प्राप्ति हो।
वाकई ईश्वर ने उनकी सुन ली और नियति की सकारात्मक लीला से यह परिवार बिहार की राजधानी पटना के बोरिग कैनाल रोड स्थित 25, उत्तरी आनंदपुरी इलाके में स्थाई रूप से 1970-80 के दशक में ही बस गया जो बाद के वर्षों में पारिवारिक दूरदर्शिता का तकाजा साबित हुआ।
यही वजह है कि आर एन एन्ड पी आर हाई स्कूल जलालाबाद, असरगंज, मुंगेर से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद श्री सिंह ने पटना का रुख भले कर लिया, लेकिन अपने गाँव-समाज के लोगों के प्रति सहृदयता, सहिष्णुता और परस्पर प्रेम का भाव शहरी चकाचौंध में रमने के बावजूद नहीं थमा और पूर्ववत बरकरार रहा, जैसा कि उदाहरण विरले ही मिलता है।
बुजुर्ग लोगों के मुताबिक श्री सिंह बचपन से ही मेधावी छात्र रहे। अपनी कुशाग्र बुद्धि के चलते क्लास में वो हमेशा ही अव्वल आये और 10 वीं से स्नातकोत्तर इतिहास की उपाधि तक थ्रू आउट प्रथम श्रेणी हासिल किये।
बताया जाता है कि संयुक्त परिवार की सदइच्छा वश इनका विवाह भी शिक्षण काल के दौरान ही नवादा जिला निवासी श्री मति रीता सिंह के साथ सम्पन्न हो गया, जो कि एक कुशल गृहणी के रूप में अपने समाज में सुप्रतिष्ठित हैं। इस दंपति को चार पुत्रियां हैं जो अपने-अपने करियर/जीवन क्षेत्र में एक से बढ़कर एक बताई जाती हैं।
कहना न होगा कि सब इंस्पेक्टर ऑफ़ पुलिस के रूप में श्री सिंह की नियुक्ति इस मायने में महत्वपूर्ण है कि स्वभाव से शिक्षाविद समझा जाने वाला युवक एक ऐसे पेशे के लिये चयनित हुआ जिसके संस्कारगत व्यवहार अकसर जुदा समझे/बताए जाते हैं। लेकिन बिहार पुलिस इस मामले में बेहद सौभाग्यशाली निकली कि उसे भी समाज को दिखाने/बताने के लिए एक और सकारात्मक मॉडल मिल गया और उसने इन्हें उभरने का भरपूर मौका भी दिया। ##

न्यूज़ सर्किल: आपकी प्रमुख विभागीय उपलब्धियां क्या-क्या हैं? आप उनसे कितना संतुष्ट हैं?

संजीव कुमार सिंह: फिलवक्त मैं जोनल आई जी ऑफिस, पटना (बिहार) में बतौर पुलिस इंस्पेक्टर पदस्थापित हूँ। मुझे
ऑल इंडिया पुलिस ड्यूटी मीट में तीन-तीन बार बिहार से प्रतिनिधित्व करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यही नहीं, ‘इन द इवेंट ऑफ़ साइंटिफिक ऐड्स टू इन्वेस्टिगेशन’ से संबंधित स्टेट पुलिस ड्यूटी मीट की कड़ी में तीन-तीन बार मैं स्टेट चैंपियन भी घोषित किया जा चुका हूँ।
कहना न होगा कि अमूमन मेरी पोस्टिंग वैशाली, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर और पटना जिले के शहरी अथवा ग्रामीण इलाके में पहले बतौर सब इंस्पेक्टर ऑफ़ पुलिस हुई और पदोन्नति मिलने के बाद पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में भी पदस्थापित हुआ और सम्पर्क में आये लोगों की निःस्वार्थ  सेवा की। फील्ड पोस्टिंग के अलावा स्पेशल ब्रांच और सीआईडी के लिए भी उल्लेखनीय कार्य करने का गौरव मुझे प्राप्त है।
बता दूं कि जब-जब मैं जिला पुलिस बल का अंग बना तो स्थानीय कतिपय कुख्यात और शातिर अपराधियों और उनके गिरोह से भी मेरा पाला पड़ा, लेकिन अविलम्ब रणनीतिक शिकस्त देकर उन्हें अपने शिकंजे में लेने और कानून के हवाले करने में मैंने कभी देरी नहीं की। यही वजह है कि आम लोगों में मेरी लोकप्रियता बढ़ती गई, जिससे मुझे सुकून व सन्तुष्टि मिली।

Highlights ## कहना न होगा कि बिहार पुलिस के बेहद कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अधिकारी समझे जाने वाले संजीव कुमार सिंह ने  बिहार पुलिस की छवि को सकारात्मक अर्थ देने में अपना अहम  योगदान दिया है। इनकी विद्वता और दृढ़निश्चयों के बारे में यदि आप जानेंगे तो वाकई बिहार पुलिस के बिखरे मोतियों के बारे में आपका नजरिया बदल जायेगा। बिहार पुलिस के इतिहास में डीएन गौतम, किशोर कुणाल जैसे कतिपय आईपीएस पुलिस अधिकारियों के बारे में तो सभी जानते हैं, लेकिन अब मैं बिहार पुलिस के उन तेजतर्रार और संस्कारवान पुलिस अधिकारियों के बारे में आपको बता रहा हूँ जिनके बारे में या तो आप जानते नहीं या फिर मानते नहीं, लेकिन ऐसा ही है। ऐसा मेरा दृढनिश्चय है। इनकी सक्रियता के बिना आईपीएस अधिकारी भी खुद को पँगु समझने लगते हैं। ##

न्यूज़ सर्किल: आपमें एक सफल शिक्षाविद होने के सारे गुण/पात्रताएँ मौजूद थीं, फिर भी आपने अपने सकारात्मक करियर के लिये पुलिस सेवा को चुना। आखिरकार इसके पीछे आपकी सोच क्या थी? आप ये भी बताइये कि सेवानिवृति के बाद की आपकी भावी योजना क्या है?

संजीव कुमार सिंह: पुलिस विभाग में अपने योगदान से मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूँ। जी हां, बिलकुल सौ फीसदी। यद्यपि अकादमिक करियर में मेरी गहरी अभिरुचि थी, लेकिन पुलिस जॉब में पीड़ितों/जरूरतमंदों की त्वरित सेवा करने से जो सुखानुभूति होती है, वह अद्वितीय है। यही वजह है कि बिना समय गंवाये पुलिस सेवा में आने का मैंने निर्णय किया और अकादमिक करियर की कभी परवाह भी नहीं की। कहना न होगा कि अपने नेक इरादे में मुझे कामयाबी भी मिली। यही वजह है कि सेवानिवृति के बाद बिना मौद्रिक लाभ लिए मैं बिहार में पुलिस विभाग के विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों में बतौर इंस्ट्रक्टर अपना योगदान दूंगा।

न्यूज़ सर्किल: आपकी नजर में बिहार पुलिस का सकारात्मक पक्ष क्या है?

संजीव कुमार सिंह: वास्तव में, तमाम दिक्कतों/मुसीबतों के बावजूद भी बिहार पुलिस अत्यंत प्रशंसनीय कार्य कर रही है। आपको पता होना चाहिए कि हरियाणा/पंजाब की तरह बिहार कोई समृद्ध राज्य नहीं है। लिहाजा अपने सीमित संसाधनों के बावजूद बिहार पुलिस जिस कुशलता से अपने लोगों की सेवा और सुरक्षा कर रही है, वह अत्यंत ही सराहनीय है। इसके लिए वह बधाई का पात्र है।

न्यूज़ सर्किल: क्या बिहार में ‘जंगलराज’ है? यदि नहीं तो फिर ‘मंगलराज’ स्थापित करने में बिहार पुलिस की सरजमीनी व्यवहारिक चुनौतियाँ क्या-क्या हैं?

संजीव कुमार सिंह: यह बात सकारात्मक सोच से इतर है जिस पर टिप्पणी करना किसी के लिए भी हमेशा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता। वाकई बिहार पुलिस जिन सरजमीनी व्यवहारिक चुनौतियों का सामना कर रही है, उसका उचित निराकरण जरूरी है ताकि कार्यगत संस्कृति और मनोबल अप्रभावित रहे। पुलिस दर्शनशास्त्र और ग्रामीण इलाके में हस्तगत कार्य परिस्थिति के बीच स्पष्ट अंतर नजर आता है। भले ही संगठनात्मक तौर पर राज्य पुलिस व्यवस्था की त्रिस्तरीय संरचनाएं- पहला राज्य स्तर पर, दूसरा जिला स्तर पर और तीसरा थाना स्तर पर, बिलकुल साउंड प्रतीत होती हैं, लेकिन जब आप विभिन्न पुलिस स्टेशन्स और आउटपोस्टस पर पुलिस के लिये उपलब्ध भौतिक संसाधनों, विशेषकर भवनों, फर्नीचर्स, टेलीफोनस, कॉन्वेयन्स, ऑफिस रिकॉर्ड्स, मालखानाज, पुलिस लॉक-अप्स, पुलिसकर्मियों के लिये रिहायशी कॉलोनियां आदि की बात करेंगे तो पता चलेगा कि वह संतोषप्रद मानक से वाकई कोशों दूर हैं, जिसका नकारात्मक असर हमारी बेहतर पुलिसिंग वाली सोच पर भी पड़े बिना नहीं रहता है।
कहना न होगा कि राज्य पुलिस का जो बजट है, उससे पुलिस की न्यूनतम जरूरतों को भी पूरा करना मुश्किल है, जबकि पुलिस स्टेशन्स की उन्नतिकरण और फेनोमेनल विस्तार बेहतर पुलिसिंग के लिहाज से अत्यंत जरूरी है। अपने-अपने पुलिस स्टेशनों से आम आदमी की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा बढ़ चुकी हैं और नवनियुक्त पुलिस अधिकारीगण भी यह महसूस कर रहे हैं कि उप-मानवीय परिस्थितियों के बीच उन्हें रहना और कार्य करना पड़ रहा है जिसमें बदलाव जरूरी है।

न्यूज़ सर्किल: बहुचर्चित मामलों में निष्ठापूर्वक कर्तव्य निर्वहन के दौरान कतिपय राजनैतिक/आर्थिक दबाव के चलते शीर्ष अधिकारियों द्वारा कभी कभार होने वाले परोक्ष हस्तक्षेप से आपलोग कैसे निपटते हैं अथवा उचित तालमेल बिठाते हैं, क्योंकि ऐसा करना तो आप जैसों के स्वभाव के पूर्णतया  विपरीत होता है?

संजीव कुमार सिंह:  एक सच्चे पुलिसकर्मी के लिए कानून द्वारा तय किये गए सेवा मूल्यों से मैं कदापि समझौता नहीं करता हूँ, और हमेशा यही कोशिश करता हूँ कि सही और उचित नियम कानून के तहत ही सौंपे गए कार्य को पूरी निष्ठा पूर्वक निष्पादित करूँ। मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरे कार्य निष्पादन के दौरान कभी भी किसी भी राजनेता या वरिष्ठ अधिकारी ने मेरा ऊपर ऐसा कोई अनावश्यक दबाव नहीं बनाया। इसलिए ऐसी बातों को मैं ज्यादा अहमियत नहीं देता। ये बनी बनाई सामाजिक अवधारणाएं हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।

न्यूज़ सर्किल: आतंकवाद, नक्सलवाद और अंडरवर्ल्ड की सक्रियता और आपसी सांठगांठ के बीच कैसे आपलोग अपने दायित्वों का निर्वहन कुशलतापूर्वक कर लेते हैं? क्या कभी आपने किसी तरह का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष दबाव महसूस किया है?

संजीव कुमार सिंह: किसी भी कार्य को कुशलतापूर्वक निष्पादित करने का मेरा अपना अंदाज है जो अत्यंत निराला है। हमारे कतिपय सुनिश्चित सिद्धांत है जिसकी कसौटी पर मैं प्रत्येक कार्य और हरेक व्यक्ति को नेक और स्पष्ट इरादे के साथ बिना लाग लपेट के कसता हूँ और यह तय करता हूँ कि क्या उचित है और क्या अनुचित, भारतीय दंड संहिता के मुताबिक।फिर वरिष्ठ अधिकारियों को विश्वास में लेकर सम्यक निर्णय करता हूँ। व्यक्तिगत तौर पर सच कहूं तो मुझे उपरोक्त समस्याओं, चुनैतियों, चीजों से कभी पाला ही नहीं पड़ा। यह मेरा सौभाग्य है।

न्यूज़ सर्किल: पुलिस की कार्यकुशलता में वृद्धि हेतु सामुदायिक पुलिस की उपयोगिता को आप किस सन्दर्भ में देखते हैं।

संजीव कुमार सिंह: सामुदायिक पुलिसिंग, पुलिसिंग की एक रणनीति है जो कि विभिन्न समुदायों के सदस्यों के साथ निकट सम्बन्ध स्थापित करके कार्य करती है और दोनों के बीच सम्यक समझौतों पर केन्द्रित होती है। सामुदायिक पुलिसिंग लॉ एनफोर्समेंट एजेंसीज और अन्य संगठनों के बीच साझेदारी का भाव पैदा करती है। ऐसे प्रतिनिधित्व के तौर पर अब मीडिया भी एक सशक्त माध्यम बन चुकी है जिसके माध्यम से पुलिस, अन्य समुदाय से बेहतर संचार सम्बन्ध स्थापित कर सकती है।  सामुदायिक पुलिसिंग इस बात को भी मानती है कि पुलिस प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा समस्याओं/जरूरतों को अकेले ही अपने दम पर हल/पूरा नहीं कर सकती है, इसलिये अन्तरसक्रिय साझेदारी का परस्पर भाव पैदा करती है। चूंकि परंपरागत पुलिसिंग किसी भी अपराध को पूरी तरह से थामने अथवा उसमें कमी करने में कारगर साबित नहीं हुई है। लिहाजा यह महत्वपूर्ण है कि सामुदायिक पुलिसिंग को किसी भी क्रोनिक क्रिमिनल प्रोब्लेम्स से निपटने में टेम्पोररी फिक्स के रूप में कारगर तौर पर लिया जाय। जबकि मेरे विचार में सामुदायिक पुलिसिंग के सहयोग से लोगों में सामाजिक वातावरण के मुताबिक क्रमानुसार सुरक्षा सम्बन्ध स्थापित और कायम रखा जा सकता है।

Facebook Comments