आखिरकार कब तक खुद को असुरक्षित महसूस करेंगी बेटियाँ ??

ये सवाल ऐसा है शायद जिसका जवाब ना तो लोगों के पास है , ना प्रशासन के पास , ना किसी राजनीतिक दल के पास , ना ही सरकार के पास और ना ही न्यायपालिका के पास है. ऐसी घटनाओं में अब बड़े स्तर पर राजनीतिक दलों के नेता भी लिप्त होते नज़र आने लगे हैं. आपराधिक मामलों के साथ साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाओं को अंजाम दे रहें हैं जो बेहद ही शर्मनाक स्थिति है. जो राजनीतिक पार्टी आज पूरे देश में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा जोर शोर से लगाती आ रही है आज उसी पार्टी के विधायक के ऊपर एक मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म तथा हत्या का गंभीर आरोप लगा है.

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ओच्छे हथकंडों पर उतारू होती राजनीति

देश के अंदर राजनीति इस हद तक गिरने पर उतारू हो जाएगी ऐसा कभी सोचा भी नही था। कोई दलितों के नाम पर राजनीति कर रहा हैकोई पटेलों पर तो कहीं जाटों पर। राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि कर्नाटक में सत्ता हथियाने के लिए लिंगायत समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर उसको भी अलग से धर्म मान लिया गया। कहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 1984 के सिख दंगों के आरोपी कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार को लेकर सांप्रदायिक सद्भावना के लिए दिल्ली के राजघाट पर 5 घंटे का उपवास रखते हैं। तो ऐसे माहौल में जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती चुप क्यों रहे। इसके बारे में और पढ़े..

माधव से मोदी तक की साधना

1977 का आपातकाल, राजनैतिक बदलाव का कालखण्ड, जनसंघ का विलय, जनता पार्टी का सत्ता में आना, दोहरी सदस्यता को लेकर पार्टी में बिखराव, कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश राजनीति के केंद्रीय भूमिका में रहा क्योंकि लाल बहादुर शास्त्री, लोहिया, जय प्रकाश नारायण, चन्द्रशेखर से लेकर चरण सिंह तक इसी भूमि के लाल थे। तब मुंबई के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन में अटल जी ने अध्यक्षीय भाषण में कहा था‘ मैं यह भी जानता हूँ कि भाजपा का अध्यक्ष पद अलंकार की वस्तु नहीं है। वस्तुतः यह पद नही, दायित्व है। प्रतिष्ठा नही, परीक्षा है। अधिकार नही, अवसर है। सत्कार नही, चुनौती है। परमात्मा से प्रार्थना हैं कि वह मुझे शक्ति तथा विवेक दे, जिससे मैं इस दायित्व को ठीक तरह से निभा सकूँ’। इसके बारे में और पढ़े..

‘नमो नमो की गूंज ‘‘

बेखबर लोंगो को (विरोधियों) को 440 वोल्ट का झटका लगेगा और वो खबरदार भी हो जाएगें। यह मोदी जी का विरोध करने वालों को आईना दिखाने जैसा होगा कि जिस मोदी जी का विरोध सत्ता पाने की चाह में विरोधी कर रहे हैं उसी को दुनिया असरदार (असर डालने वाला) नेता मानती है, कहती है, लिखती है। जी हां अबकी बार पूरे विश्व के 100 प्रभावशाली शख्सियतों को अप्रैल माह में टाइम्स पत्रिका में जगह मिलेगी। जो मौजूदा मुद्दों को लेकर दुनिया भर पर असर डाल रहे है।

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मोदी सरकार और व्यवस्था परिवर्तन

परिवर्तन एक प्रक्रिया है जो निरंतर गतिमान रहती है | परिवर्तन सकारात्मक होगा या नकारात्मक यह नियोजन व प्रबंधन पर निर्भर करता है |  देश में 1947 ( अंतरिम सरकार)  से सरकारों का गठन होता रहा है | गठित सरकारों ने देश व देशवासियों के विकास करने के प्रयास किये किन्तु ऐसा क्या था कि देश को जहाँ होना चाहिए था वह वहाँ पर पहुँच पाया था | ऐसा क्या था कि केन्द्र से चलने वाला 1 रूपया नीचे आम नागरिकों तक पहुँचने पर 15 पैसे हो जाता था 85 पैसे बीच में गायब हो जाते थे?  इसके लिए दोषी निःसंदेह व्यवस्था थी |

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जिनकी शहादत पर पूरा हिन्दूस्तान रो पड़ा…

भगत, सुखदेव और राजगुरू के शहादत दिवस पर विशेष

23 मार्च को भारतवासी कैसे भूला सकता है?  इसी दिन देशभक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू ने भारत माता को परतंत्रता की बेड़ियो से आजाद करवाने के लिए मौत को गले लगाया था. इन तीन वीर सपूतों को अपने मौत का कोई गम नहीं था, बल्कि इनके चेहरे पर खुशी का भाव था कि उनकी शहादत ने लोगों में आजादी के प्रति जुनून पैदा कर गया. 23 मार्च कोई समान्य तिथि नहीं है…इसी दिन भारत के कोने कोने में क्रांति की लौ जल उठी थी और  युवाओं ने अपने सुख-वैभव को त्यागकर आजादी के तराने गाने शुरू किया था….यह दिवस न केवल देश के प्रति सम्मान बल्कि अपने गौरवशाली इतिहास को भी भान करवाता है. इसके बारे में और पढ़े..

।। जल संकट एक बड़ी चुनौती ।।

 

22 मार्च विश्व जल दिवस. जल प्रकृति की एक ऐसी अनमोल धरोहर जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। जैसे जीने के लिए साँस , लेना आवश्यक है उसी प्रकार पीने के लिये शुद्ध जल हमारे लिये बेहद जरूरी है , क्योंकि स्वच्छ एवं सुरक्षित जल अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है. लगभग धरती के दो तिहाई हिस्से पर पानी भरा हुआ है. फिर भी पीने योग्य शुद्ध जल पृथ्वी पर मात्र एक प्रतिशत हिस्सा ही है.

लगभग 97% प्रतिशत जल महासागर में खारे पानी के रूप में भरा हुआ है और शेष रहा दो प्रतिशत जल बर्फ के रूप में जमा है. आज समय है यह है कि हम मनुष्य पानी की कीमत को नहीं समझ रहे हैं जिसके कारण जल की बहुत बड़ी संकट पूरे दुनिया के समक्ष उत्पन्न हो रही है. हमें यह समझना होगा कि यदि जल को हम संरक्षित नहीं करेंगे तो आने वाले कुछ समय में हमारे पास पीने का पानी नहीं बचेगा और यह एक पूरे विश्व के सामने बहुत बड़े संकट के रूप में प्रकट होगा. इसके बारे में और पढ़े..

शहादत का धर्म

‘‘शहादत का धर्म’’

(23 मार्च शहीद दिवस विशेष)

 

 

23 मार्च 1931 पंजाब के लाहौर में हलचल तेज थी कि 24 मार्च को देश के तीन रणबाकुरों भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू को फाँसी दी जायेगी। लाहौर की जेल में बन्द नौजवानों की ये टोली मनमस्त फकिरी में थी। 23 मार्च को भगत सिंह, पुस्तक पढ़ रहे थे। जेलर ने आकर एक दिन पहले ही फाँसी की सूचना दी तो उनका आग्रह था कि उन्हें फाँसी के बजाय उन्हें गोली से उड़ा दिया जाय, लेकिन फिरंगी सरकार टाल गयी थी। देश भक्तों ने जेल को घेर रखा था, पर सायं 7 बजकर 34 मिनट पर जेल में वन्देमातरम्, इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए तीनों माँ भारती के पुत्रों ने अपनी शहादत दे दी। उन्हें जेल की पीछे की दीवार तोड़कर रात में सतलुज के किनारे ले जा कर मिटटी का तेल डालकर जलाने के प्रयास हुआ। अधजली लाशों को नदी में बहा दिया गया। जिसकी सूचना होने पर देशभर में भारी विरोध हुआ।

 

आज देश स्वतंत्र भी है लेकिन सामाजिक असमानता, संकीर्णता, स्वार्थपरता, वैमनस्यता, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद, आतंकवाद जैसी समस्याओं से समाज जूझ रहा है। तथाकथित अराष्ट्रीय ताकते भगत सिंह के क्रान्ति सिद्धान्त की आड़ लेकर आतंकवादी गतिविधियों का खुला समर्थन कर रही है। स्वधर्म, राष्ट्रधर्म, समाजधर्म, मानवधर्म की रक्षा के लिए क्रन्तिवीरों ने क्रान्ति का मार्ग अपनाया था। उनके आदेश थे, ‘‘अन्याय जुल्म के खिलाफ बागी बनों’’ जहाँ राष्ट्रीय मूल्यों और समाज के प्रति षड़यन्त्र, अन्याय, जुल्म हो उसके खिलाफ बगावत धर्म है। 1924 में भगत सिंह ने विश्व प्रेम शीर्षक से लिखे लेख में वसुधैव कुटुम्बकम् की भारतीय संकल्पना को साकार किया था। जिसमें सेवा समानता मातृभूमि के प्रति अन्यन्य प्रेम, जनसामान्य के दुःखदर्द को दूर करने की बात की थी। आज देश अबाध गति से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा आन्तरिक और वाह्य खतरे में है। कश्मीर से लेकर दण्डकारण्य में जवानों को बलिदान देना पड़ रहा है। सवा सौ करोड़ देश वासियों की राष्ट्र भक्ति पर भ्रष्टाचार, जातिवाद, असमानता, आर्थिक विषमता भारी पड़ रही है। आज कुछ निहित स्वार्थी लोगों द्वारा भगत सिंह के स्वधर्म, सिद्धान्त, क्रान्ति को गलत दिशा दे रहे हैं। भगत सिंह खालसा पंथ में जन्मे थे। आर्य समाज के वेद विचार उनकी प्रेरणा थी। आन्दोलन के दौरान गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने अपने केश कटाये थे, वेश बदल कर दुर्गा भाभी के साथ बच निकले थे। बचपन में अंग्रेजों द्वारा संचालित स्कूल में गाड की प्रार्थना होने के साथ उन्होंने विद्यालय बदल कर डी.ए.वी. कालेज से पढ़ाई की थी। शिवराम हरि राजगुरू सनातनी परम्परा के थे तो सुखदेव का परिवार वैदिक आर्य समाजी था। तीनों का भारतीय संस्कृति धर्म में अटूट श्रद्धा थी लेकिन इन्हें ‘‘नास्तिक’’ बनाने की होड़ लगी रहती है। हिन्दूधर्म संस्कृति, आस्तिक, नास्तिक दोनों है जो अनेक पंथों की जननी है। सबको अपना पंथ, पूजा, परम्परा निर्वहन का अधिकार है पर राष्ट्रधर्म, समाजधर्म सबका एक है। सब भारत माँ के लाल हैं भारतीय हैं, उस समय देश को स्वतंत्र कराना समृद्ध, समर्थ और समरस खुशहाल समाज बनाना ही सबका राष्ट्र धर्म था। आजादी की रक्षा के लिए ‘‘बम का दर्शन’’ मानवता को सर्वश्रेष्ठ बनाने का दर्शन था। ‘‘सर्वेभवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माकश्चिद् दुःख भागभवेत’’ इसके लिए लड़ना ही राष्ट्रधर्म समाज धर्म है। इसके लिए भगत सिंह ने भारतीय युवकों का आह्वान किया था कि

 

ऐ भारतीय युवक ! तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है! उठ, आँखें खोल, देख प्राची-दिशा का ललाट सिन्दूर-रंजित हो उठा है। अब अधिक मत सो। सोना हो तो अन्नत निद्रा की गोद में जाकर सो रहा। कापुरूषता के क्रोड़ में क्यों सोता है?

 

माया-मोह-ममता का त्याग कर गरज उठ-

“Farewell Farewell My true Love
The army is on move;
And if I stayed with you Love,
A coward I shall prove”

 

तेरी माता, तेरी प्रातः स्मरणीया, तेरी परम वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्यमामलांचला आज फूट-फूटकर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती? धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर! तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपंुसकत्व पर ! यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो, तो उठ कर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आँसुओं की एक-एक बूँद की सौगन्ध ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कण्ठ से वन्देमातरम्।

आज देश के लिए मरने न ही जीने की आवश्यकता है। यही शहादत का राष्ट्रधर्म है।

~राजकुमार 

 

बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर जी और उनके विचारों का प्रासंगिकता

स्वजनो नमस्कार…
कितने प्रासंगिक हैं भारत रत्न, भारतीय संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष, श्रद्धेय भीमराव आम्बेडकर उपाख्य बाबा साहब और उनके विचार ?

बाबा साहब ने संविधान को प्रारूपित ( ड्राफ्ट ) करते समय पूरे संविधान में दलित शब्द का उल्लेख कहीं नहीं किया है? फिर भी स्वघोषित आम्बेडकरवादी धड़ल्ले से इस गैर संवैधानिक शब्द का प्रयोग करते हैं | बाबा साहब ने इस बात की स्वीकारोक्ति की थी कि उन्होने वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, संहिता , अरण्यक आदि सभी को गम्भीरता से पढ़ा और कहीं अस्पर्श्यता का उल्लेख नहीं मिलता है | इसके बारे में और पढ़े..

बसपा ने किया सपा के आगे आत्मसमर्पण – डा. महेन्द्र नाथ पाण्डेय

लखनऊ: भारतीय जनता पार्टी प्रदेश अध्यक्ष डा0 महेन्द्र नाथ पाण्डेय ने इलाहाबाद में जनसभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में भाजपा की जीत से घबराकर बसपा ने सपा के आगे आत्मसमर्पण किया है। पिछड़े, दलित, सवर्णो के साथ हर वर्ग मोदी जी के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चल रहा है। सपा-बसपा ने जाति के नाम पर ठग कर अपनी तिजोरियां भरी। मुलायम, मायावती, अखिलेश यादव का रिकार्ड जनसेवा का कभी नहीं रहा। इसके बारे में और पढ़े..

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