बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर जी और उनके विचारों का प्रासंगिकता

स्वजनो नमस्कार…
कितने प्रासंगिक हैं भारत रत्न, भारतीय संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष, श्रद्धेय भीमराव आम्बेडकर उपाख्य बाबा साहब और उनके विचार ?

बाबा साहब ने संविधान को प्रारूपित ( ड्राफ्ट ) करते समय पूरे संविधान में दलित शब्द का उल्लेख कहीं नहीं किया है? फिर भी स्वघोषित आम्बेडकरवादी धड़ल्ले से इस गैर संवैधानिक शब्द का प्रयोग करते हैं | बाबा साहब ने इस बात की स्वीकारोक्ति की थी कि उन्होने वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, संहिता , अरण्यक आदि सभी को गम्भीरता से पढ़ा और कहीं अस्पर्श्यता का उल्लेख नहीं मिलता है | भारतीय समाज जीवन में अस्पर्श्यता कोई बारह तेरह सौ वर्ष पूर्व आई और धीरे धीरे जड़वत होती गयी | ( बारह तेरह सौ वर्ष पूर्व कौन भारत में आये? यह चिंतन और विश्लेषण का विषय है |) जब बाबा साहब ने गम्भीर अध्ययन के पश्चात ये बातें कहीं तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी इस बात पर विश्वास करके अस्पर्श्यता के कारण के निवारण की दिशा में कार्य क्यों नहीं करते हैं? आखिर क्यों बाबा साहब ने अपने ब्राह्मण शिक्षक के द्वारा दिये गये उपनाम आम्बेडकर (सरनेम ) को जीवन भर अपने से जोड़े रखा जबकि उनका वास्तविक उपनाम सकपाल था ? यह चिंतन का विषय है | बाबासाहब ने स्वयं कहा कि मैं कम्युनिस्टों का दुश्मन नम्बर एक हूँ तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी कम्युनिस्टों से गलबहियाँ क्यों करते हैं? बाबा साहब ने जब मतांतरण करने का निर्णय लिया तो मुसलमान और ईसाई दोनो मतावलम्बी बाबासाहब से मिले और उन्हें सनातन धर्म छोड़कर मुस्लिम व ईसाई मत स्वीकार करने का आग्रह किया | बाबासाहब ने मुस्लिम और ईसाई मतावलम्बियों से कहा कि यह दोनो मत / पंथ मूल रूप से भारतीय मत नहीं है इसलिए मैं इन्हें स्वीकार नहीं कर सकता हूँ | तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी आखिर क्यों इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं ? अपितु स्वहितों के लिए वह इन मतों को मूल भारतीय मत कहते घूमते हैं | बाबा साहब समाज में व्याप्त जड़ता और बुराईयों को विनष्ट करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे और वह चाहते थे कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े न्यूनतम स्तर के व्यक्ति तक मूलभूत सुविधाएं पहुँचनी चाहिए तो फिर आम्बेडकरवादी अपने वंचित शोषित सर्वहारा वर्ग के अंतिम व्यक्ति तक मूलभूत सुविधाएं क्यों नहीं पहुँचने दे रहे हैं? बाबासाहब समाज में गैर बराबरी को विनष्ट करना चाहते थे और समरस, सामंजस्यपूर्ण, सहकारी भावपूर्ण समाज रचना पुनर्निर्मित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी क्यों समाज में बदस्तूर वर्ग संघर्ष और जाति संघर्ष निर्मित करने के कुटिल प्रयास निरंतर कर रहे हैं?

स्वजनो डॉ भीमराव आम्बेडकर जी ने कोई मत प्रतिपादित नहीं किया अपितु सनातन धर्म के मौलिक स्वरूप को स्पष्ट रूप से निराकार सर्वशक्तिमान की उपासना को प्रेरित करने और अात्मज्ञान को विकसित करने के भगवान बुद्ध के विचार बौद्धमत को स्वीकार किया तथा प्रत्येक व्यक्ति को कहा कि शिक्षित बनो – सक्षम बनो – संघर्ष करो | तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी नकल विहीन सर्वस्पर्शी सर्वव्यापक शिक्षा प्रणाली जिससे योग्य व सक्षम विद्यार्थी युवा शक्ति निर्मित होगी के लिए संघर्ष करते हैं? बाबासाहब ने सदैव चिंतनशील जागरूक समाज रचना पुनर्निर्मित करने पर बल दिया है तो फिर स्वघोषित आम्बेडकरवादी चिंतनशील जागरूक व्यक्ति निर्माण के बजाय भीड़तंत्र निर्माण पर जोर क्यों देते हैं?
स्वजनो बाबासाहब के विचार निर्विवाद रूप से प्रासंगिक है और रहेंगे किन्तु स्वघोषित आम्बेडकरवादी सिर्फ और सिर्फ श्रद्धेय बाबासाहब के नाम का उपयोग करके अपने व्यैक्तिक स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं तथा वंचित, शोषित , पीड़ित , विपन्न , अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को ठग रहे हैं |
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आलोक कुमार पाण्डेय
शोध एवं नीति विषयक विभाग
भाजपा उत्तर प्रदेश
9450223220

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