पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का गांव आधारित अर्थव्यवस्था का सपना, मोदी सरकार कर रही है साकार: बालियान
Date posted: 17 June 2020
लखनऊ: केंद्रीय राज्य मंत्री पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन संजीव बालियान ने भाजपा उत्तर प्रदेश द्वारा आयोजित आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत डिजिटल माध्यम से पशुपालक किसानों से संवाद करते हुए कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय और चैधरी चरण सिंह ने गांव आधारित अर्थव्यवस्था की सोच रखते हुए कहा था कि गांव की उन्नति होगी तभी देश की उन्नति संभव है। प्राचीन काल में हमारे देश का हर गांव आत्मनिर्भर था। हमें फिर अपने गांवों को आत्मनिर्भर बनाना है। गांवों के अंदर रोजगार के लिए जरूरी है कि लोेग डेयरी, मत्स्य पालन, सीप पालन, एनिमल हसबेंडरी, मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में आगे बढें। इन सभी क्षेत्रों के लिए सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी दे रही है।
गाय, भैंस, मछली आदि ऐसे साधन हैं जिनके जरिए लोगों को काम मिल सकता है। इसके लिए पैकेज रखा गया है। उसमें किसानों को पशुपालन के लिए लोन दिया जाएगा। उन्हांेंने कहा कि गांव के अंदर किसान अपना स्वयं सहायता समूह बनाकर इन क्षेत्रों में काम कर सकते र्हैं। केंद्र सरकार द्वारा पशुपालकों को भी किसान क्रेडिट कार्ड की तर्ज पर उसी ब्याज दर पर क्रेडिट कार्ड बनाकर सब्सिडी देने का प्रावधान है। कार्यक्रम का संचालन प्रदेश मंत्री कामेश्वर सिंह ने किया।
श्री वालियान ने कहा कि, आजादी के बाद पहली बार देश में गरीब को देश की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का काम प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया है। गांव आधारित अर्थव्यवस्था का सपना पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने देखा था उसी ओर मोदी सरकार ने अपने कदम बढ़ा दिए है। पशुपालन के क्षेत्र में बहुत सी संभावनाएं हैं। इस क्षेत्र के लिए 53 हजार करोड़ का पैकेज आया है। चावल और गेहूं से ज्यादा पशुपालन के क्षेत्र में कारोबार होता है। आठ करोड़ लोग डेयरी उद्योग से जुड़े हैं। एनिमल हसबेंडरी में असीम संभावनाएं हैं और यहां से रोजगार भी पैदा होगा। श्री बालियान ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत का वही अर्थ है, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सपना था कि गांव में देश की आत्मा बसती है। लेकिन कोरोना के इस संक्रमण ने इस बात का एहसास करा दिया। गांव पहले आत्मनिर्भर हुआ करते थे। सारे काम गांव में हो जाया करते थे। फिर शहरीकरण आया। गांव से पलायन शुरू हुआ और गांव में वही लोग रह गए जो नहीं जा सकते थे। कोरोना ने फिर से गांव की ताकत को दिखाया है। लोग फिर अपने गांव लौट रहे हैं। इन गांवों को आत्मनिर्भर बनाना ही अब आत्मनिर्भर भारत का तात्पर्य है।
उन्होने कहा कि पशुपालको को कोऑपरेटिव के साथ, फिशरीज उद्योग के साथ हम इन लोगों को जोड़ेंगे। जो दूध उत्पादन करते है उसका 50 फीसद खुद पीता है और 50 फीसद बेचते है। इसमें से 10 फीसद कोऑपरेटिव के पास जाता है और 10 फीसद निजी क्षेत्र के पास। 25 से 30 फीसद असंगठित क्षेत्र में जाता है या दूध वाले बांटते हैं। कोरोना काल में असंगठित क्षेत्र बिखर गया लेकिन किसानों को को-ऑपरेटिव की तरफ से वही दाम मिलते रहे जो पहले मिलते थे। हम इस 25 से 30 फीसद असंगठित क्षेत्र के दूध को भी संगठित क्षेत्र में लाना चाहते हैं, ताकि पशुपालक किसान सुरक्षित रहें। इसके लिए नई प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाने पर काम किया जा रहा है। हम 175 से 176 लाख टन दूध का उत्पादन करते हैं और इस मामले में दुनिया में नंबर वन हैं। कोऑपरेटिव और संगठित क्षेत्र को बढ़ावा देना जरूरी है। इसके लिए 5000 करोड़ का बजट रखा गया है। इस रकम का एक साल का ब्याज हम देंगे।
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