संसद में भले ही गणित कड़वा हो, लेकिन महाभियोग पर बहस में सरकार ज्ञानेश के बचाव में उतरी तो इकबाल खत्म, न उतरे तो ज्ञानेश विशेष से शेष। धर्मेंद्र प्रधान बन गये ज्ञानेश, तो जरूर बच जाएंगे
नई दिल्ली, भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य पर छाए अनिश्चितता के काले बादलों और चुनावी शुचिता पर मंडराते गंभीर सवालों के बीच, भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे चौराहे पर आ खडा हुआ है जहाँ हर नागरिक का अधिकार दांव पर है। तेरह करोड़ से ज्यादा वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा देना — ये सामान्य बात है, श्रीमान ज्ञानेश कुमार? ECI के तीन सदस्यों में से दो के लिखित विरोध को दरकिनार कर देना — ये सामान्य है? चुनाव के बाद सारा डेटा 45 दिन में मिटा देना, आधार कार्ड को वैध दस्तावेजों की सूची से हटा देना, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को भी न मानना, एक ऐसी वोटिंग व्यवस्था बनाए रखना जिसमें पारदर्शिता नहीं और खुद के लिए आजीवन अदालतों से मुक्ति (immunity) ले लेना — क्या यह सब सामान्य है?
नहीं, श्रीमान ज्ञानेश, इसमें कुछ भी सामान्य नहीं है।
इतिहास गवाह है कि इसी देश में एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरी थी, लेकिन आज करोड़ों वोटों का अस्तित्व बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के मिटाया जा रहा है। 2026 का आगामी चुनाव चक्र अब केवल हार-जीत का मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात का निर्णायक जनमत संग्रह बनने जा रहा है कि भारत में लोकतंत्र की सांसें बाकी हैं या चुनावी मशीनरी पूरी तरह से कठपुतली बन चुकी है।
आपके कार्यकाल में देश ने जो घटनाक्रम देखा है उसने भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत विश्वसनीयता को हिला दिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की विस्फोटक जांच रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग को मजबूरन एक ‘डैमेज-कंट्रोल’ प्रेस नोट जारी करना पड़ा, लेकिन उसने किसी आरोप का तार्किक खंडन नहीं किया। इस रिपोर्ट में यह सामने आया कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूची से 13 करोड़ से ज्यादा (13.37 करोड़ यानी करीब 14.1%) नाम काट दिए गए, जिसमें दिल्ली में सबसे ज्यादा 32.8% नाम काटे गए। यही वह सबसे विवादास्पद प्रक्रिया है जिसे चुनाव आयोग के ही दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने दस महीनों में कम से कम 14 बार (एक ही दिन में चार बार भी) लिखित रूप से “अनधिकृत और गैरकानूनी” कहा।
आपके नेतृत्व वाले आयोग ने अपने नौ-बिंदु वाले बयान में दावा किया कि सारे फैसले “सर्वसम्मत” थे और अलग-अलग राय होना “विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा” है — लेकिन उस बयान में कहीं भी इस बात से इनकार नहीं किया गया कि वो 14 आपत्तियां दर्ज हुई थीं। पूर्व चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने सटीक तर्क दिया है कि जब तीन में से दो सदस्य एक तरफ हैं, तो बहुमत के बेसिक नियम के अनुसार उनकी राय को ही अंतिम फैसला मानना चाहिए, क्योंकि अदालतों में भी यही होता है।
इसीलिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को जो सीधी चेतावनी दी कि: “समय आएगा! हम आपको पकड़ेंगे! आप बच नहीं पाएंगे,” यह अभूतपूर्व और बेमिसाल है। राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर धांधली के आरोप पहली बार नहीं लगाए; उन्होंने बंगलोर में एटम बम प्रेस कॉन्फ्रेंस, बिहार में जिले-जिले में जाकर रैलियां, हरियाणा फाइल्स और दिल्ली में लगातार इस मुद्दे पर आवाज़ उठाई, लेकिन गोदी मीडिया ने इसको उचित महत्व न देकर देश को अंधेरे में रखा और अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया।
गुरुवार, 24 सितंबर को राहुल गांधी ने इस मुद्दे को एक बार फिर पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाया। कांग्रेस मुख्यालय में 55 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सिर्फ आलोचना नहीं की — सीधा आरोप जड़ दिया। उन्होंने CEC, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को “देशद्रोही” कहा, ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की और उन्हें बचने का एक रास्ता दिखाते हुए “सरकारी गवाह (approver) बनने” को कहा, जिसे उन्होंने “राष्ट्रभक्ति का काम” बताया।
राहुल ने कहा, “हम आज उस जगह खड़े हैं जहां 1947 के बाद कभी नहीं खड़े थे — हमारा चुनाव पूरी तरह टूट चुका है, हमारा वोट खत्म कर दिया गया है।” उन्होंने पीएम मोदी और अमित शाह के वीडियो क्लिप दिखाए, जिनमें दावा किया गया था कि भाजपा दशकों तक सत्ता में रहेगी। राहुल का बयान साफ है: “अगर कल भाजपा चुनाव जीत गई, तो किसी को भरोसा नहीं होगा।” फिर उन्होंने वो सवाल किया, जो दस साल से भारत की राजनीति में सीनाजोरी कर रहा है, कि राहुल गांधी जीतते क्यों नहीं।
राहुल गांधी ने पूछा — एंटी-इनकंबेंसी गायब कैसे हो जाती है? उन्होंने कहा, “हरियाणा 50 साल से एक पार्टी से दूसरी पार्टी के पास जाता रहा। अचानक एंटी-इनकंबेंसी गायब हो गई।” उन्होंने महाराष्ट्र, यूपी, मध्य प्रदेश और गुजरात का जिक्र किया और जोड़ा: “सद्दाम हुसैन के इराक में एंटी-इनकंबेंसी नहीं होती थी। उत्तर कोरिया में नहीं होती। इस धरती पर कोई लोकतंत्र नहीं है जहां एंटी-इनकंबेंसी न हो।” बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार पर भी चुनावी धांधली के गंभीर आरोप लगे थे। सच ये है कि महाराष्ट्र, यूपी, मध्य प्रदेश, बिहार और हरियाणा में सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी की लहर दिख रही थी — फिर भी नतीजे सत्ता पक्ष के पक्ष में आए। यह सवाल अब किसी नेता का सवाल नहीं, देश का सवाल बन चुका है।
अंधेरे की पूरी गुफा को सत्य का एक शक्तिशाली बल्ब रौशन कर देता है। उसी तरह हजारों करोड़ से खड़े किए गये गोदी मीडिया को एक अखबार इंडियन एक्सप्रेस के एक रिपोर्टर की एक रिपोर्ट ने धराशाई कर दिया। एक रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति को हिला दिया है, वैसे ही जैसे हिंडनबर्ग की एक रिपोर्ट ने दुनिया भर में हंगामा मचा दिया था। असली मीडिया की यही ताकत है, और यही भूमिका भी। चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं।
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश की मानें, तो पहले दो चरणों में 7.8 करोड़ नाम काटे गए, जो पूर्व-SIR मतदाता सूची का 13% है। तीसरे चरण में 12 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों के 36.06 करोड़ मतदाताओं में से 6.18 करोड़ नाम काटे गए—यानी 17% से अधिक। इसके अलावा 5.43 करोड़ मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं, जिससे कुल मिलाकर लगभग एक तिहाई (32%) मतदाता या तो बाहर हो चुके हैं या बाहर होने के खतरे में हैं।
इस मुद्दे को गहराई से समझना जरूरी है कि CEC ज्ञानेश कुमार की एकतरफा निर्णय-प्रक्रिया का सिलसिला आखिर कैसे चला और कैसे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी को अहम फैसलों से बाहर रखा गया। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट बताती है कि संधू और जोशी ने कम से कम 14 बार लिखित औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराईं — उन फैसलों पर जो उनकी जानकारी के बिना लिए गए। फॉर्म-6 में अनधिकृत और गैरकानूनी तरीके से नया सवाल जोड़ा गया कि आवेदक या उसके माता-पिता/दादा-दादी पिछली SIR सूची में थे या नहीं। जोशी ने मई में चेताया कि नियम बदले बिना ये संभव नहीं, संधू ने इसे अनधिकृत कहकर हटाने की मांग की, पर बदलाव फिर भी लागू रहा।
जोशी ने वोटर डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण पर सवाल उठाया, वहीं संधू ने कहा कि राज्य स्तर के अधिकारियों को ERONet पोर्टल पर पूरी पहुंच नहीं दी जा रही। करीब 16 लाख अपीलें पूरे आयोग की जानकारी के बिना दायर की गईं और संधू ने पूछा कि जिन वोटरों को न्यायिक अधिकारियों ने बहाल किया, उनके खिलाफ अपील किसने और किस अधिकार से दायर की?
गोवा में सॉफ्टवेयर फेल हुआ, जहाँ ERO ने 97 वोटरों को योग्य पाया, लेकिन सॉफ्टवेयर में डिलीशन वापस लेने का विकल्प ही नहीं था —
अधिकारियों ने आठ बार ईमेल किया पर सुनवाई नहीं हुई। अंततः IT डिवीजन की निगरानी पूरे पैनल की मंजूरी के बिना हटाए जाने के बाद दोनों आयुक्तों ने आंतरिक चैनल छोड़कर कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को सूचित किया। लेकिन वे अगर कैबिनेट सचिव के पास गये, तो क्या कैबिनेट सचिव ने राष्ट्रपति को सूचना दी? सवाल अनुत्तरित है।
आयोग का जवाब इनकार नहीं, सिर्फ टालमटोल रहा। उप निदेशक पी. पवन के हस्ताक्षर वाले बयान में कहा गया कि अलग-अलग राय विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा होती हैं और पिछले एक साल में सभी फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मत सहमति से लिए गए। लेकिन अगर फैसले सचमुच सर्वसम्मत थे, तो दो आयुक्तों ने 10 महीनों में 14 बार लिखित आपत्ति क्यों दर्ज कराई? इसका जवाब आयोग के बयान में कहीं नहीं है। बहुमत की उन लिखित आपत्तियों को किस आधार पर खारिज किया गया? अब कांग्रेस ने महाभियोग लाने का संकेत दिया है — यानी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरह हटाया जा सकता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को, जिसके लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी है। एनडीए के भीतर से उठ रही दबी-दबी आवाज़ों को सुनिए। विपक्षी सूत्रों के मुताबिक प्रस्ताव कानूनी विशेषज्ञों के साथ तैयार हो रहा है और संयुक्त विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में दिया जाएगा। TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के मुताबिक राज्यसभा के 60 से ज्यादा सांसद पांच महीने पहले ही अध्यक्ष को CEC हटाने की मांग का पत्र लिख चुके हैं।
संसद में भले ही गणित कड़वा हो और महाभियोग प्रक्रियागत रूप से पास न हो, पर इसका मकसद संसद के पटल पर बहस को मजबूर करना, सरकार से CEC का बचाव करवाना और 2026 के चुनाव चक्र को इस सवाल का जनमत संग्रह बना देना है कि वोट की ईमानदारी बची है या नहीं। सरकार बचाव में उतरे तो इकबाल खत्म, न उतरे तो ज्ञानेश विशेष से शेष।
राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बनने का जो संकेत दिया है, वह एक कानूनी पेशकश और अल्टीमेटम भी है। भारतीय दंड प्रक्रिया में approver वो सह-अभियुक्त होता है जो सजा में छूट के बदले साजिश के दूसरे लोगों के खिलाफ गवाही देता है। राहुल कह रहे हैं: आप जानते हैं आदेश किसने दिए, इस्तीफा दीजिए, सच बोलिए, वरना रास्ता जेल का है। संजय राउत ने इसे और सीधे शब्दों में कहा कि ज्ञानेश कुमार को जेल जाना पड़ेगा और उनके आका देश छोड़कर भाग जाएंगे।
अब भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि यह तो पहले से चला आ रहा है और कांग्रेस के समय से घपलेबाजी का आरोप अपने पाप छुपाने के लिए बोला जा रहा झूठ है — जिसमें पहले अपने अपराध के कबूलनामे का स्वर है।
तथ्य देखिए: इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद हारीं क्योंकि चुनाव आयोग आजाद था; 1977 में इंदिरा रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से हारे, आयोग अडिग रहा। अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार जीते, पर चुनाव आयोग पर सवाल नहीं उठा। 10 वर्ष बाद मोदी ने मनमोहन सिंह को हराया, क्योंकि चुनाव आयोग आजाद था; 2014 और 2019 के नतीजे स्वीकार किए गए। इनमें से किसी भी चुनाव आयुक्त को कभी असाधारण उन्मुक्ति (Immunity) नहीं दी गई।
CEC और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 CEC और EC को उनके आधिकारिक कामों के लिए दीवानी और आपराधिक उन्मुक्ति देती है। पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने इसे “चौंकाने वाला” कहा। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा की संवैधानिकता पर सुनवाई कर रहा है और TMC सांसद महुआ मोइत्रा की दलील है कि यह सुरक्षा तभी लागू होती है जब आयोग सामूहिक रूप से काम करे — न कि जब CEC अकेले फैसले ले।
चुनावी विसंगतियां महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक फैली हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर के मरकडवाड़ी गांव में ग्रामीणों ने EVM नतीजों पर शक जताते हुए खुद का मॉक री-पोल कराया, बैलट पेपर पर वोट डाले, पर पुलिस ने रोकने के लिए नोटिस जारी किए — क्योंकि उन्हें भेद खुलने का भय था? तमिलनाडु में 2016 के राधापुरम चुनाव में सिर्फ 49 वोटों से हारे DMK नेता एम. अप्पावु को जून 2026 में मद्रास हाईकोर्ट ने दोबारा गिनती में 103 वोटों से विजेता घोषित किया, यानी चुनाव के 10 साल बाद। ADR के डेटा मिसमैच के सवालों का जवाब आज तक नहीं आया।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR के 65 लाख गायब वोटरों का डेटा सार्वजनिक करने का आदेश दिया। राहुल गांधी का आरोप है कि 2024 में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच महाराष्ट्र में 39 लाख नए वोटर जुड़े, और अब ड्राफ्ट सूची से 2.1 करोड़ वोटर हटा दिए गए। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि 14 आपत्तियां महज चर्चाएं थीं और अलग राय होना जीवंत लोकतंत्र का लक्षण है। लेकिन अभिजीत दीपके ने वो सवाल उठाया है जिसे काटा नहीं जा सकता: जब भी ECI, ED या CBI पर सवाल उठते हैं, बचाव में सबसे पहले भाजपा क्यों आती है? जो दल किसी संवैधानिक संस्था को जांच से बचाने के लिए दौड़ा चला आता है, वो संस्था की रक्षा नहीं कर रहा — वो अपने औजार की रक्षा कर रहा है।
आयोग ने 13 करोड़ नाम काटे और कहा कि ये मरे हुए, पलायन कर गए या डुप्लीकेट वोटर हैं। पहले ये कहानी बनाई गई थी कि SIR की जरूरत इसलिए है क्योंकि सूची में बहुत सारे बांग्लादेशी, रोहिंग्या और नेपाली घुसपैठिए हैं। तो सवाल ये है — आयोग ने इनमें से कितने व्यक्तियों के नामों की सिफारिश डिपोर्टेशन के लिए की? कितने बांग्लादेशी या रोहिंग्याओं की पहचान की? अगर नहीं — अगर ये ऐसे भारतीय नागरिक हैं जिनके नाम बिना विधि-सम्मत प्रक्रिया के मिटा दिए गए — तो ये सफाई नहीं, घोटाला है।
सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है कि नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं है। वोटर लिस्ट से नाम काट देना किसी व्यक्ति को व्यावहारिक रूप से गैर-नागरिक बना देता है। और अगर वे गैर-नागरिक हैं, तो उन्हें इस देश में रहने की इजाजत कैसे है? खासकर तब, जब उनके पास आधार कार्ड है — वही आधार कार्ड, जिसे खुद प्रधानमंत्री मोदी ने “मेरा आधार, मेरी पहचान” कहकर प्रमाणित किया था। आयोग ने प्रधानमंत्री के इस नारे को क्यों मिटाया? भाजपा ने मोदी के सुप्रसिद्ध आधार कार्ड और प्रधानमंत्री की साख मिटाने के आयोग के फैसले पर सवाल क्यों नहीं उठाया?
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर विदेशियों की जानकारी नहीं दी गई है। क्यों? जो मुद्दा बीजेपी 60 साल से अधिक समय से उठा रही है, उस राष्ट्रीय मुद्दे पर 60 पंक्तियां भी लिखना चाहिए। अगर बांग्लादेशी नागरिक मिले, तो उन्हें आयोग की रिपोर्ट में स्पष्टतया दर्ज होना चाहिए। अपराधियों के नाम-फोटो जैसे थाने में चिपकाते हैं, इनके क्यों नहीं? और क्या केन्द्रीय गृह मंत्रालय को लिखा कि ये इतने लाख बांग्लादेशी मिले, यानी हमने डिटेक्ट किये, अब उन्हें आप तुरंत डिटेन यानी गिरफ्तार करें और डिपोर्ट करें?
असम में 2019 में जो एनआरसी किया गया था, उसमें भी 19 लाख नाम कटे, लेकिन उन्हें डिटेन और डिपोर्ट वैसे ही क्यों नहीं किया गया, जैसे अमेरिका ने किया? सत्य नहीं, या साहस नहीं? कांग्रेस ने इस मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है, वामदलों ने सप्ताह भर के विरोध की घोषणा की है, TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने CEC के खिलाफ पुलिस में शिकायत दी है, FIR की मांग की है और विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव की तैयारी में है। चुनाव आयोग का प्रेस नोट, जो तूफान शांत करने के लिए लिखा गया था, उलटा उन्हीं आरोपों की पुष्टि बन गया जिन्हें वो खारिज करना चाहता था।
राहुल गांधी की चेतावनी दोषियों के लिए हाड़ कंपाने वाली है — “समय आएगा, हम आपको पकड़ेंगे”। यह कड़ा संदेश केवल चुनाव आयोग के लिए नहीं है; यह सच साबित होगा, इसमें किसी संदेह की गुंजाइश नहीं दिखती। कुलमिलाकर भारत की चुनावी मशीनरी की विश्वसनीयता एक धागे पर टंगी है, और 2026 के चुनाव चक्र का रास्ता अब संवैधानिक बारूद से पटा पड़ा है। हर एक वोट मायने रखता है; वो नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। 13 करोड़ वोट मिटा देना कोई प्रशासनिक काम नहीं — ये गणतंत्र पर सीधा हमला है।
आज सारा लोकतांत्रिक हिंदुस्तान नेता प्रतिपक्ष श्री राहुल गांधी और सभी विपक्षी दलों के साथ खड़ा है — लोकतंत्र और भारत के संविधान को बचाने की इस लड़ाई में। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल पंजीकृत मतदाता लगभग 97.97 करोड़ थे, जिनमें से 64.64 करोड़ ने मतदान किया; भाजपा को 23.59 करोड़ वोट और 240 सीटें मिलीं, पूरा एनडीए गठबंधन 28.26 करोड़ वोट और 293 सीटों तक पहुँचा, जबकि विपक्षी इंडिया गठबंधन को लगभग 26.19 करोड़ वोट और 234 सीटें मिलीं—इस प्रकार कुल मतदाताओं में से लगभग 69.7 करोड़ एनडीए के बाहर रहे। काक्रोचों (सीजेपी) के छोटे से आंदोलन ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की बलि ले ली। एनडीए के भीतर से उठती अंतरात्मा की आवाज़ें भी कुछ कह रही हैं। छात्र फिर आंदोलित हैं। और राहुल गांधी अडिग अंगद। सत्यमेव जयते।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)